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Property New Rule:
भारत में जमीन और संपत्ति को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या बेटियों को पिता की प्रॉपर्टी में हक मिलेगा या नहीं। पहले ज्यादातर लोग मानते थे कि सिर्फ बेटों को ही हिस्सा मिलता है, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। कानून में समय-समय पर बदलाव हुए हैं और बेटियों को भी बराबरी का हक दिया गया है। फिर भी समाज में आज भी कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं।
अब नई नीतियों और डिजिटल रजिस्ट्रेशन सिस्टम आने से यह साफ हो गया है कि बेटियों का भी पिता की जमीन और संपत्ति में पूरा हक है। इसलिए यह जानना बहुत जरूरी है कि असलियत क्या है और नए नियमों के तहत बेटियों को कौन-कौन से अधिकार मिले हैं।
बेटियों का हक पैतृक संपत्ति में:
भारतीय कानून साफ कहता है कि अगर जमीन या संपत्ति पैतृक है यानी खानदानी तरीके से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, तो उसमें बेटा और बेटी दोनों का बराबर हक होता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट भी कई बार अपने फैसलों में साफ कर चुके हैं कि बेटी को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर हिस्सा मिलेगा और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता।
हालांकि अगर जमीन या संपत्ति पिता ने अपनी कमाई से खरीदी है, तो उस पर पूरा अधिकार पिता का होगा। ऐसे मामले में यह पिता की इच्छा पर निर्भर करता है कि वे अपनी निजी संपत्ति में बेटी को हिस्सा दें या नहीं।
2025 का नया डिजिटल नियम और बेटियों के अधिकार:
1 सितंबर 2025 से सरकार ने जमीन और संपत्ति रजिस्ट्री के लिए नई डिजिटल नीति लागू की है। अब सारी प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन होगी, जिससे काम न सिर्फ आसान और तेज़ होगा बल्कि भ्रष्टाचार की संभावना भी काफी कम हो जाएगी। इस नई व्यवस्था में खास ध्यान महिलाओं और बेटियों के अधिकारों पर दिया गया है। डिजिटल रजिस्ट्रेशन से अब कोई भी संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड ऑनलाइन देख सकता है और धोखाधड़ी की संभावना काफी हद तक खत्म हो जाएगी।
महिलाओं के लिए अलग सहायता केंद्र भी बनाए गए हैं, ताकि वे आसानी से अपने हक से जुड़ी जानकारी और मदद पा सकें। सरकार का साफ मकसद है कि बेटियों को संपत्ति में बराबरी का कानूनी अधिकार मिले और किसी भी महिला को अपने अधिकार पाने में परेशानी न हो।
संपत्ति बंटवारे का नियम:
अगर पिता की मृत्यु बिना वसीयत लिखे हो जाती है, तो संपत्ति का बंटवारा भारतीय उत्तराधिकार कानून के अनुसार होता है। इस स्थिति में पत्नी, बेटे और बेटियों सभी को बराबर का हिस्सा मिलता है। यहां तक कि अगर कोई बेटा या बेटी पहले ही गुजर चुके हों, तो उनके बच्चों को भी उतना ही अधिकार दिया जाता है। विधवा मां को भी संपत्ति में समान हिस्सा मिलता है।
जमीन बांटने का तरीका सीधा है—सबको बराबरी का हक। लेकिन अगर पिता ने अपनी जिंदगी में वसीयत लिख रखी है, तो फिर संपत्ति उसी व्यक्ति को मिलेगी जिसका नाम वसीयत में दर्ज होगा। अगर परिवार में आपसी सहमति नहीं बनती, तो बंटवारे का हल निकालने के लिए अदालत की मदद ली जा सकती है।
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वसीयत का महत्व:
वसीयत एक अहम दस्तावेज है जिसमें व्यक्ति यह तय करता है कि उसकी संपत्ति किसे मिलेगी। अगर पिता ने वसीयत लिखी है, तो बंटवारा उसी के अनुसार होगा।
हालांकि कानूनी वारिसों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वसीयत तभी मान्य होती है जब वह साफ भाषा में और गवाहों की मौजूदगी में लिखी गई हो। जरूरत पड़ने पर इसे चुनौती भी दी जा सकती है।
बेटियों के हक को लेकर फैली गलतफहमियां:
समाज में आज भी कई तरह की भ्रांतियां हैं कि बेटियों को जमीन में हिस्सा नहीं मिलता। सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि संपत्ति सिर्फ बेटों को मिलती है, जबकि सच यह है कि पैतृक संपत्ति में बेटा और बेटी दोनों का बराबर अधिकार होता है।
एक और आम धारणा है कि शादीशुदा बेटी का पिता की संपत्ति में कोई हक नहीं होता, लेकिन यह भी पूरी तरह गलत है। शादी के बाद भी बेटी का अपने हिस्से पर पूरा कानूनी अधिकार बना रहता है। यहां तक कि बेटी अपने हिस्से की जमीन की मालिक होती है और चाहे तो उसे बेच भी सकती है। यानी साफ है कि बेटियों के हक को लेकर जो भी भ्रांतियां फैली हुई हैं, वे सिर्फ सामाजिक सोच तक सीमित हैं, कानून में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।
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Disclaimer
यह जानकारी सार्वजनिक स्रोतों और इंटरनेट पर उपलब्ध सामान्य जानकारियों पर आधारित है — इसे 100% सत्य मानकर कोई कानूनी कदम न उठाएँ। संपत्ति कानून राज्य-वार और मामले के हिसाब से अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने से पहले योग्य वकील से परामर्श ज़रूर लें। यह सामग्री व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं है; हम केवल सामान्य मार्गदर्शन दे रहे हैं — कृपया सोच-समझकर आगे बढ़ें।
Published On: September 17, 2025 9:06 PM by Chandrahas
